Friday, January 27, 2023
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देखिये इन मसालो की कीमते हो रही है सोने के बराबर जानिए पूरी खबर

सर्दियों के दस्तक देते ही रसोई में मसालों की महक बढ़ जाती है। ऐसे में एक खास मसाले का जिक्र लाज़िम है, जो कभी सोने से भी ज्यादा बेशकीमती माना जाता था। इसे भारत ने ही बाकी दुनिया को भेंट दिया। हम बात कर रहे हैं काली मिर्च की।

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काली मिर्च को अंग्रेजी में पेपर (Black Pepper) कहा जाता है। पेपर शब्द संस्कृति के पिपली शब्द से निकला है, जो एक लंबी काली मिर्च थी। इसका 18-19वीं शताब्दी से पहले भारतीय पकवानों में काफी इस्तेमाल होता था क्योंकि तब तक हमारा वास्ता हरी और लाल मिर्च से नहीं पड़ा था। ये दोनों मिर्च पुर्तगाल की देन हैं, जिन्हें वास्कोडिगामा अपने साथ लाया। वास्कोडिगामा काली मिर्च की ही तलाश में भारत आया था, जो उस वक्त यूरोप में सोने के भाव बिकती थी। वहीं, चिली पेपर दक्षिण अमेरिका की पैदाइश है। जब क्रिस्टोफर कोलंबस अमेरिका पहुंचा, तो उसके बाद यूरोप और बाकी दुनिया को मिर्च के बारे में पता चला।

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पुर्तगाली लोग मिर्च को गोवा लाए और फिर कर्नाटक में इसकी बड़े पैमाने खेती होने लगी। लेकिन, उससे पहले उत्तर भारत की अधिकतर रसोइयों में पीपली और केरल से आने वाली काली मिर्च का ही इस्तेमाल होता था। 19वीं सदी के दौरान मुगल और शुरुआती एंग्लो-इंडियन खाने के बारे में कई किताबें लिखी गईं। उनमें भी पकवान में तीखापन लाने के लिए काली मिर्च के इस्तेमाल(Use of Black Peeper) का जिक्र है। आमतौर पर, होता यह था कि काली मिर्च और इलायची को एकसाथ पीसकर खाना पकाने के आखिरी चरण में व्यंजनों पर छिड़का जाता था।

मालाबार तट की काली मिर्च ने उत्तर भारत की शाही रसोइयों में अपनी खास जगह बनाई। भारत इसे पुराने जमाने से ही दुनिया को बांटता आया है। आज से तकरीबन 4 हजार साल पहले से काली मिर्च की खेती के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। हालांकि, दुनिया के लिए यह कितना बेशकीमती मसाला था, इसकी मिसाल करीब 2 हजार साल पुराने साहित्यिक ग्रंथों में मिलती है। उस दौरान दक्षिण भारत में संगम दौर की कविताओं की बयार थी। इन कविताओं में केरल के लापता हो चुके मुजिरिस बंदरगाह का भी जिक्र होता। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह था। ग्रीक नावें सोने और आला दर्जे की शराबों से लदकर इसी बंदरगाह पर आती थीं और उनका सौदा काली मिर्च के बदले किया जाता। प्राचीन तमिल कविताओं में बड़ी खूबसूरती से बताया गया है कि किस तरह लहरों को चीरते हुए ये नावें आगे बढ़ती थीं और मुजिरिस शहर कितना संपन्न और खुशहाल था।

अब किसी को नहीं पता कि यह बंदरगाह कहां था। कुछ पुरातत्व विज्ञानी इसके अवशेष खोजने में जुटे हैं। लेकिन, इतना तो तय है कि काली मिर्च की वजह से यूरोप की दौलत भारत आ रही थी। प्राचीन रोम के लेखाकर प्लिंकी द एल्डर की किताबों से भी यह चीज जाहिर होती है। एल्डर ने नाराजगी भरे शब्दों में लिखा है, ‘भारत से काली मिर्च के कारोबार पर रोम हर साल 5 से 10 करोड़ सेस्ट्रेस खर्च करता है। भारत अपनी सारी काली मिर्च सोने के बदले यूरोप भेज रहा है।’ सेस्ट्रेस प्राचीन रोम की मुद्रा थी।

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आखिर काली मिर्च इतनी बेशकीमती क्यों थी? इसकी एक वजह तो यही थी कि काली मिर्च से मीट का जायका बेहतर हो जाता था, वह भी मीट के कुदरती स्वाद से छेड़छाड़ किए बिना। पुराना मिथक है कि काली मिर्च का उपयोग मांस को खराब होने से बचाने के लिए किया जाता था। लेकिन, यह बात बिलकुल गलत है। काली मिर्च बहुत महंगी थी और इसका इस्तेमाल सिर्फ रईस लोग करते थे। उन रईसों के लिए ताजा मांस खरीदना चुटकी बजाने का काम था। तो वे फिर मांस को खराब होने से बचाने के लिए काली मिर्च पर पैसे क्यों खर्च करते? नमक मांस को सुरक्षित रखने काम काफी सस्ते में करता था। यह पुराना रिवाज आज भी यूरोप के साल्टेड मीट और फिश के मामले में देखा जा सकता है।

काली मिर्च को इतिहास में हमेशा सेहत के लिए फायदेमंद मसाले के तौर पर देखा गया। यह कफ और सर्दी में आराम पहुंचाती है। शरीर को तंदुरुस्त भी रखती है। मान्यता तो यहां तक है कि यह बुरी आत्माओं को पास नहीं फटकने देती। हो सकता है इन्हीं वजहों से काली मिर्च का भाव सोने के बराबर रहा हो।

दक्षिण भारत में रसम में काली मिर्च का इस्तेमाल आम है। सांभर के मुकाबले रसम काफी पुराना पकवान है। सांभर तो दक्षिण में मराठों का दबदबा बनने के बाद रसोई में आया। मराठे दक्षिण में अपनी अमती दाल ले गए, जो वहां सांभर बन गया।

उत्तर भारत की शाही रसोइयों में भी काली मिर्च की डिमांड (Demand of Black Pepper )यूरोप से कम नहीं थी। मुगल बादशाह शाहजहां ने तो बाकायदा हुक्म दे रखा था कि उसे नाश्ते में काली मिर्च के पानी में उबला मीट परोसा जाए। दरअसल, शाहजहां उन दिनों शाहजहांनाबाद में रहता था। आज जिसे हम पुरानी दिल्ली के नाम से जानते हैं, वही मोटे तौर पर उन दिनों का शाहजहांनाबाद था। सर्दियों के महीने में यमुना के ठंडे पानी से जुकाम होने का जोखिम था। काली मिर्च वाला नुस्खा बादशाह को सर्दी से बचाता था। शाहजहां की रसोई का वह पकवान आज भी पुरानी दिल्ली में खासा मशहूर है। इसे निहारी कहा जाता है। निहारी कितनी अच्छी है, इसका अंदाजा उसमें काली मिर्च की नुमाइश से लगाया जा सकता है।

यूरोप के शाही परिवार काली का इस्तेमाल अलग ही अंदाज में करते थे। 18वीं सदी के दौरान मौसमी फल और सब्जियों के साथ खाने की टेबल पर नमक और काली मिर्च रखने की शुरुआत फ्रांसीसी रसोइयों से हुई। दरअसल, फ्रांस के राजा लुई चौदहवें ने हुक्म दिया था कि उसकी रसोई में काली मिर्च के अलावा कोई भी दूसरा मसाला इस्तेमाल न किया जाए। इसलिए मौसमी फल और सब्जियों के मूल स्वाद को बरकरार रखने के लिए नमक और काली मिर्च का उपयोग होने लगा।

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