Gratuity Rule 2025: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारियों की ग्रेच्युटी रोकना अब आसान नहीं

Gratuity Rule 2025 भारत में कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जिनमें से एक प्रमुख है ग्रेच्युटी एक्ट, 1972। यह अधिनियम कर्मचारियों को एक निश्चित अवधि की सेवा के बाद अनिवार्य रूप से एकमुश्त भुगतान (gratuity) देने का प्रावधान करता है। हाल ही में, एक हाईकोर्ट के फैसले ने इस अधिनियम को और अधिक सशक्त बनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी नियोक्ता अब मनमाने तरीके से कर्मचारी की ग्रेच्युटी रोक नहीं सकता।


Gratuity Rule 2025: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारियों की ग्रेच्युटी रोकना अब आसान नहीं

भारतीय हाईकोर्ट द्वारा ग्रेच्युटी से जुड़े नए फैसले की जानकारी पढ़ते कर्मचारी

हाईकोर्ट का फैसला क्या कहता है

हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी की ग्रेच्युटी रोकना चाहता है, तो पहले उसे वैध कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी। यानी, बिना किसी रिकवरी प्रक्रिया, आरोप सिद्ध हुए बिना, ग्रेच्युटी को रोका नहीं जा सकता।

यह फैसला उस मामले में आया, जहाँ एक सरकारी कर्मचारी की सेवा पूरी होने के बावजूद उसकी ग्रेच्युटी राशि को यह कहते हुए रोक दिया गया कि उस पर विभागीय जांच लंबित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच या संदेह मात्र के आधार पर कर्मचारी की वैध कमाई रोकी नहीं जा सकती।


ग्रेच्युटी अधिनियम 1972: एक संक्षिप्त अवलोकन

भारत का ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972 के अनुसार:

  • यदि कोई कर्मचारी एक ही संस्था में 5 साल या अधिक की निरंतर सेवा करता है, तो वह ग्रेच्युटी के लिए पात्र होता है।
  • ग्रेच्युटी की गणना अंतिम वेतन और सेवा अवधि के आधार पर की जाती है।
  • यह राशि तब दी जाती है जब कर्मचारी सेवानिवृत्त हो, नौकरी छोड़ दे या उसकी मृत्यु हो जाए।

धारा 4(6) के अनुसार, कुछ विशेष मामलों (जैसे गबन, धोखाधड़ी, गंभीर अनुशासनहीनता) में ही ग्रेच्युटी रोकी जा सकती है, लेकिन वो भी साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के तहत।


फैसले का प्रभाव:

कर्मचारियों के लिए फायदे:

  1. कानूनी सुरक्षा मजबूत हुई: अब ग्रेच्युटी रोकने के लिए नियोक्ता को मजबूरी में कानूनी रास्ता अपनाना पड़ेगा।
  2. मनमानी पर रोक: कई बार कंपनियां छोटे-छोटे बहानों से ग्रेच्युटी रोक देती थीं, अब यह मुश्किल होगा।
  3. न्यायिक सहारा: यदि कोई नियोक्ता नियमों का उल्लंघन करता है, तो कर्मचारी सीधे कोर्ट में केस कर सकता है।

नियोक्ताओं के लिए जवाबदेही:

  1. रिकॉर्ड रखना जरूरी: कोई भी आरोप सिद्ध करने के लिए पुख्ता दस्तावेज रखने होंगे।
  2. रिकवरी प्रक्रिया लागू करना होगी: सीधे राशि रोकने की बजाय पहले आरोप सिद्ध करने होंगे।
  3. कानूनी कार्रवाई का खतरा: यदि कर्मचारी कोर्ट गया और प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो कंपनी पर जुर्माना लग सकता है।

एक उदाहरण से समझें:

मान लीजिए कि “राम कुमार” नामक कर्मचारी ने एक सरकारी विभाग में 20 वर्षों तक सेवा दी और अब सेवानिवृत्त हो रहा है। विभाग को शक है कि उसने किसी कार्य में अनियमितता की है। पुराने नियमों के अनुसार विभाग ग्रेच्युटी रोक सकता था, लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद, पहले विभाग को:

  1. आरोप पत्र जारी करना होगा,
  2. जांच प्रक्रिया शुरू करनी होगी,
  3. यदि दोष सिद्ध होता है, तभी ग्रेच्युटी में कटौती संभव होगी।

यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है

यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि लाखों कर्मचारियों के हितों को प्रभावित करता है। खासकर सरकारी कर्मचारियों और बड़ी कंपनियों में काम कर रहे लोगों के लिए यह एक संरक्षण कवच जैसा है।


क्या करें यदि आपकी ग्रेच्युटी रोक दी गई है

  1. अपना सेवा रिकॉर्ड और नियुक्ति पत्र देखें – क्या आपने 5 वर्ष पूरे किए?
  2. कंपनी से लिखित में कारण मांगें – क्या आपको कोई आरोप पत्र मिला?
  3. RTI या HR विभाग से रिपोर्ट लें – ग्रेच्युटी क्यों रोकी गई, इसका कारण लिखित में लें।
  4. लेबर कमिश्नर या कोर्ट का सहारा लें – यदि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो मामला दर्ज कराएं।

हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल कर्मचारियों के लिए एक संविधानिक जीत है, बल्कि यह नियोक्ताओं को भी न्यायसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने की सीख देता है।
इस फैसले से यह सिद्ध होता है कि भारत की न्यायपालिका कर्मचारियों के अधिकारों के प्रति सजग और संवेदनशील है। अब हर कर्मचारी को अपनी ग्रेच्युटी के लिए संविधानिक सुरक्षा मिली हुई है, बशर्ते वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो।