Friday, February 3, 2023
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मटर की खेती कर आप बन सकते हैं लखपति, जानिए कैसे करते हैं मटर की खेती

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मटर की खेती : खेती करने वाले लोगों की संख्या में दिन पर दिन बढ़ोतरी होती जा रही है. आपको बता दें कि लगातार होने वाली बढ़ोतरी को देखते हुए आजकल अधिकतर युवा खेती-बाड़ी में हाथ आजमाने लगे हैं.

मटर को दलहनी फसल कहा जाता है और मुख्यता इसे सर्दियों के दिनों में ही उप जाया जाता है. लेकिन आजकल मटर हर मौसम में मिलने लगा है और कई ऐसी विदेशी किस्म की इन्वर्टर है जो कि हर मौसम में मिलते हैं. आज हम आपको मटर की खेती के बारे में बताने वाले हैं.

अक्टूबर से नवंबर के महीने के बीच मटर की खेती की रोपाई की जाती है और मटर की खेती के लिए ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि इस खेती में किसी भी तरह के कीड़े ना लगे. कीड़े पूरे फसल को बर्बाद कर सकते हैं और आपके सारे सपनों पर पानी फेर सकते हैं.

इस खेती में अधिक जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए और जरूरत के हिसाब से इस में नाइट्रोजन डालना चाहिए. आपको बता दें कि ज्यादा खाद से पूरा फसल खराब हो सकता है. वही समय समय पर सिंचाई भी करना चाहिए क्योंकि सिंचाई से काफी अधिक लाभ मिलता है.

भारत के मटर की मांग कई देशों में की होती है और पश्चिमी देशों में तो भारत के मटर की विशेष मांग है. आपको बता दें कि यह बहुत जल्द तैयार हो जाता है इसलिए यह आपके लिए एक मुनाफा का सौदा हो सकता है.

मटर की खेती मटर की वैरायटी / मटर की अगेती किस्म / मटर की अगेती किस्में व उनकी विशेषताएं

आर्किल
यह व्यापक रूप से उगाई जाने वाली यह प्रजाति फ्रांस से आई विदेशी प्रजाति है। इसका दाना निकलने का प्रतिशत अधिक (40 प्रतिशत) है। यह ताजा बाजार में बेचने और निर्जलीकरण दोनों के लिए उपयुक्त है। पहली चुनाई बोआई के बाद 60-65 दिन लेती है। हरी फली के उपज 8-10 टन प्रति हेक्टेयर है।

बी.एल.
अगेती मटर – 7 (वी एल – 7)- विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा में विकसित प्रजाति है। इसका छिलका उतारने पर 42 प्रतिशत दाना के साथ 10 टन / हेक्टेयर की औसत उपज प्राप्त होती है।

जवाहर मटर 3 (जे एम 3, अर्ली दिसम्बर)
यह प्रजाति जबलपुर में टी 19 व अर्ली बैजर के संकरण के बाद वरणों द्वारा विकसित की गई है। इस प्रजाति में दाना प्राप्ति प्रतिशत अधिक (45 प्रतिशत) होता है। बुवाई के 50-50 दिनों के बाद पहली तुड़ाई प्रारंभ होती है। औसत उपज 4 टन/हैक्टेयर है।

जवाहर मटर – 4 ( जे एम 4)
यह प्रजाति जबलपुर में संकर टी 19 और लिटिल मार्वल से उन्नत पीड़ी वरणों द्वारा विकसित की गई थी। इसकी 70 दिनों के बाद पहली तुड़ाई शुरू की जा सकती है। इसके 40 प्रतिशत निकाले गए दानों से युक्त औसत फल उपज 7 टन/ हैक्टेयर होती है।

हरभजन (ईसी 33866)
यह प्रजाति विदेशी आनुवंशिक सामग्री से वरण द्वारा जबलपुर में विकसित की गई है। यह अधिक अगेती प्रजाति है और इसकी पहली चुनाई बोआई के 45 दिनों के बाद की जा सकती है। इससे औसत फली उपज 3 टन/हैक्टेयर प्राप्त की जा सकती है।

पंत मटर – 2 (पी एम – 2)
यह पंतनगर में संकर अर्ली बैजर व आई पी, 3 (पंत उपहार) से वंशावली वरण द्वारा विकसित हैं। इसकी बुवाई के 60- 65 दिन बाद पहली चुनाई की जा सकती है। यह भी चूर्णिल फफूंदी के प्रति अधिक ग्रहणशील है। इसकी औसत उपज 7 – 8 टन प्रति हैक्टेयर प्राप्त की जा सकती हैं।


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